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Yes its sinking in.. Rank 40, CSE 2015.The UPSC circle- the close and the beginning.

Bagh-e-Bahisht Se Mujhe Hukam-e-Safar Diya Tha Kyun Kaar-e-Jahan Daraz Hai, Ab Mera Intezar Kar                      - Mohammad...

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Thursday, June 26, 2014

Creation and God.

...sometimes search itself
becomes some destination.
creation creates 
God smiles.
...and then one day humanity hope and belief
are made into meaningless lifeless objects
creation destroys
God smiles.

creation.
may you know one day.
what you chose for your comfort
will stay with you in this life.
may it stay.
what you left, was real.
so it will die with someone silently, calm
to be born in a next life
a next world.
but from you forever away.
but from you forever away.

CREATION CHOOSES HEAVEN OR HELL.
GOD SMILES

(p.s: as i write this, a song stirs me up
a song really close)
https://www.youtube.com/watch?v=T94PHkuydcw
"Qadam badha le;Hadon ko mita le,
Aaja khaalipan mein, Pi ka ghar tera.
Tere bin khaali aaja khaalipan mein"

(may you fill this void, the abode of your Beloved.
Its empty without you, come fill this void.)
"Tu hai mujh mein samaaya;Kahaan leke mujhe aaya.
Main hoon tujh mein samaaya
Tere peeche chala aaya,
Tere hi main ik saaya."
(You live within me, and now,
where have You brought me?
I live in You,
I have only followed You,
I am but Your shadow.)



Creation seeks answers.
God smiles.

Monday, August 2, 2010

आकार


डरती थी मिटटी जो, फिर चाक चड़ने से;
तपने
से, फिर भीगने से, टूटने से, पिघलने से
तू
आंचों में सौ पका के
फिर
चाक मुझको चढ़ा के
तू
चोट करता है
फिर
उसको भरता है
देता
मुझको 'आकार' है...

तू
ताप दे कि, पिघल मैं सकूँ जिससे
इस
आग पर तेरी, चल मै सकूँ हँस के
बंधन
तू कुछ तोड़ता है
धागे
तू यूँ जोड़ता है...
तू ही मिटाता है
फिर
से बनाता है
देता
मुझको 'आकार' है...

Monday, July 5, 2010

पिंजरा.

'वह' कैद था. पर वह दुखी नहीं था। जिसने आकाश का विस्तार कभी न देखा हो, वह अपनों सीमित और छोटी सी दुनिया में ही 'सुख' ढूँढ लेता है. पर सुख और तृप्ति भिन्न हुआ करते हैं। वह लोहे के उस संरक्षण में 'सुख' तो ढूँढ लिया करता था, पर 'तृप्ति' से मीलों दूर था। क्योंकि 'तृप्ति' के लिए 'खोज' ज़रूरी होती है। भाग्यशाली होते हैं वो लोग जिन्हें इस खोज का अवसर प्राप्त होता है। उस शाम पिंजरे में कैद उस हरित पंची को भी ये अवसर मिला उस शाम...

मेरे लिए वो लोहे का पिंजरा 'घर' सा बन गया था। बहुत वक़्त से खुद को वहीँ और उसी अवस्था में देखा था। मेरी आवश्यकताएं तो पूरी हो ही जाती थी उस पिंजरे में. पर कुछ खाली था मुझमे कुछ चुप कुछ जमा सा

'वह' आया। 'वह' पिंजरे में कैद मुझ हरित पंछी को देखा करता। मानो मेरे पंखों में बसी उस चिन्मयी शक्ति से परिचित हो वह शक्ति, जिससे मेरी आत्मा स्वयं अनभिज्ञ थी। कुछ था उन दो नेत्रों में। कुछ बारिश से पहले आकाश में घुले मेघों सा अस्पष्ट। कुछ सागर कि तेज़ उफनती लहरों के बीच खड़े बड़े पत्थर सा स्थिर और दृड़। कुछ कहा... कुछ अनकहा....
कुछ...
जिसने मुझे पहली बार एहसास दिलाया कि मै खुबसूरत हूँ कि मै ख़ास हूँ कि मै सपने देख सकता हूँ कि मै उड़ सकता हूँ.....

'उसने' आज तक मुझसे कुछ नहीं कहा। बस मेरे पिंजरे कि सलाखों को खटखटाता रहता मानो मेरी चेतना से परिचित हो मेरी व्यथा को जानता हो
उसकी संजीदगी बताती थी कि वह दुनिया देख चूका था कि उसे भी बहुत हसने का शौंक रहा था पहले। जाने क्यूँ उस तटस्थ भाव से मेरे बंधन खोलने कि चेष्ठ में जुटा था। जैसे मुझसे और मेरी चेतना शक्ति से परिचित हो...

वो अकेले कभी मिलता; तो झंझोरती उसे
जहाँ जहाँ से वो टूटा था, जोडती उसे.

पर कुछ था कि वो ऊपर सा हो गया था सुख से, दुःख से, ख़ुशी से, दर्द से, मिलन से, विरह से... या कोशिश कर रहा था खुद को एक सपने के लिए तैयार करने कि. कहता कि मै दुनिया जीतना चाहता हूँ पर उसके लिए मुझे खुद को जीतना होगा. पर उसका प्रयत्न नहीं चूकता था....

ज़रा सोचिये, कितना बड़ा कद रहा होगा उसका
मुझसे मिलने वह बुलंदी से उतर कर आता था

वह 'आस्था' था, तो वह उड़ान भर पाने कि 'चाह' था।
वह 'साधना' था, तो वह कभी न शिथिल होने का 'निश्चय' था।
वह 'संघर्ष' था, तोह वह मुक्ति कि श्वास था।
वह अभय था वह भक्ति था वह कथा था वह जय था

शाम होने को थी। सूर्यास्त का समय था। मंदिर से घंटियों कि ध्वनियाँ गूँज रहीं थी। जब सूर्यास्त के समय पंछी जंगलों में अपने नीदों कि ओरे वापिस जा रहें होतें हैं, तोह उसने वो पिंजरा खोल दिया। उसने स्वप्नों के चित्र पर वास्तविकता के रंग बिखेर दिए, क्योंकि पंख होना एक बात है; और उड़ पाना दूसरी। उसने छोटी सी दुनिया में कैद मुझ पंछी को आज सारा आकाश दे दिया.
वह मुक्ति था वह चेतना था अब वह कभी समाप्त होने वाला संघर्ष था

हम अक्सर दूसरों में सहारा दूंदतें हैं 'उसने' मुझे कभी 'सहारा' नहीं दिया। 'उसने' मेरी हथेली खींचकर मुझे पिंजरे से बहार निकला। उसने मेरी हथेली पर एक नाम लिखा वह उसका नहीं था वह नाम मेरा था. 'उसने' मुझे जीवन में पहली बार 'मुझसे' मिलाया। और एहसास दिलाया कि-
'मै सबसे बेहतर हूँ
मै उड़ सकती
हूँ

ऊँचा बहुत ऊँचा....'

लगा कि मुझको उठाकर, कोई फिर खड़ा कर गया
और 'मेरे दर्द' से, 'मुझको' बड़ा कर गया.

अब मै आज़ाद थी। सारा आकाश मेरा । वो पिंजरे टूट चुके थे जो दुनिया ने मेरे लिए बना रखे थे। जो मैंने खुद के लिए बना रखे थे वो पिंजरे सिर्फ लोहे के पिंजरे नहीं थे। वो पिंजरा था हर उस डर का जिससे जीतने कि बात वो करता था हर उस बंदिश का जो मुझे खुश रहने के अधिकार से वंचित करती थी वो पिंजरा था भ्रम का परितोष का भ्रांतियों का
आज
वो टूट गया था। आज 'मै' खुश थीआज 'वो' खुश था और 'आज' को जीने का अधिकार था हमें

जिस पल ब्रह्माण्ड के किसी कण में सच्ची चाह का उदभव होता है, उस पल दरीखे खटखटाए जातें हैं। खिड़कियाँ टूटती हैं। और पिंजरे में किस चिन्मयी शक्ति को मुक्त करने के लिए श्रृष्टि प्रयत्न में जुट जाती है।

हम अपने जीवन में खुद को बहुत से पिंजरों में कैद करते जातें हैं। दायरों और दीवारों में बंद करते जाते हैं। सीझ्तें रहतें हैं उड़ने से, भीगने से, टूटने से... फिर 'कोई' आता है दरवाजों पर दस्तक देता है पिंजरों को तोड़ने कि चेष्ठा करता है. वह इश्वर का बंदा है। वास पाक है। वह सत्य है। उसकी आवाज़ सुन लीजिये। खुद को पिंजरे से आज़ाद कर दीजिये। क्योंकि...

पिंजरों को खुलना होगा। दीवारों को टूटना होगा। मन में जमे हर डर, हर बंदिश को पिघल कर बहना होगा। ह्रदय में जो यह नन्हा पंछी बैठा है उड़ने को तत्पर, उसे उसका नीला आकाश बाहें फैलाये बुला रहा है। उसे उड़ने दो...

अब डर नहीं है। अब आस्था है। मेरे साथ। मेरे पास। और यह आस्था 'उसे' ढून्ढ लेगी जीवन की लकीरों में...

जो चाहो तो कोई सीमा नहीं है
नहीं चाहो तो सीमायें बहुत हैं
आज बतला दो इनमें 'तुम' कहाँ हो?
मेरे हाथों में रेखाएं बहुत हैं....




Saturday, May 29, 2010

तू...


Wrote this sum tym back...
Jus wanna blog it 2day....

तू ही तो है ; बस एक तू, मेरे हर कण में तेरा नाम है।
मेरी रूह में बस्ता है तू; कृष्णा है तू; तू राम है।

मंदिर में तू, मस्जिद में तू; गिरिजा है, तू गुरुद्वार है।
जन- जन को मन से जोड़ दे; तू वह आलोकिक प्यार है.

कबीरा कि उज्जवल वाणी तू, मीरा का निश्छल प्रेम है।
सिन्धु भी उसे डूबा सके; जिस पत्थर पे तेरा नाम है।

नभ में, नदी में, बाग़ में; मैंने ढूंडा तुझे हर वन में है।
पर इक क्षण जो खुद में लीं हो; पाया तू मेरे मन में है

आधार दे इस सृष्टी को जो, मेरी छुपी वह शक्ति है.
जो ज्वार बन टकराए तट से; तू मेरी वेह अभिव्यक्ति है

पवन से करता है शीतल, मिटटी के मेरे शरीर को।
तू ताप देता है मुझे; कि पिघला सके मेरी पीर को।

तू है, तू व्योम है; तत्सत कि तू इकाई है।
ब्रहमांड़ का विस्तार है तू; तू प्रेम है, तू साईं है

तेरी हर रज़ा स्वीकार है; तेरा फैसला स्वीकार है
तुने लिख दिया स्वीकार है; बिन प्रश्न अब स्वीकार है

तू चाहे अब मुझे थाम ले; चाहे अधुरा छोड़ दे।
बिखरे सिरे मेरे बाँध दे; चाहे तो तू मुझे तोड़ दे।

मिटटी हूँ मैं, मै धुल हूँ; विस्तृत तू आकाश है।
कहतें हैं मुझसे दूर है; मुझमे है तू, मेरे पास है।

मिटटी के मेरे शरीर में, मेरे दर्द में, मेरी पीड़ में
मेरी आत्मा, मेरी ज्योत में; अस्तित्व के मेरे स्त्रोत में
मेरी हर उखड्ती सांस में; मेरे टूटते विश्वास में...
तू ही तो है, बस एक तू; मेरे हर कण में तेरा नाम है;
मेरी रूह में बस्ता है तू; कृष्णा है तू, तू राम है...