शहरों से शहरों के बीच, तू मिल जाता है मुझको
हर एक रास्ते पर
हरा या पीला या सतरंगा कोई पेड़ बनके
मैं गाड़ी की खिड़की से तकतीं हूँ ,
तेरी शाखों पर बंधे धागे
- धागों से वादे -
- वादों से नग़में -
- और नग़मों से गुनगुनाती -
मिट्टी की ख़ुशबू
बारिश की थिरकन
पत्तों की कंपन
और आसमां का मुझपर आसरा।
फिर भी इन शहरों में लोग अक्सर मुझसे पूछा करतें हैं,
" तू है कहाँ ?"
