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Tuesday, October 20, 2015

Essays on journey...


सच क्या है ,और क्या दर्पण-सा? 
है भी जो, है भी नहीं, भ्रम सा 
सागर सा नीला तो लगता है, 
पानी है या रेत सुलगता है?  
वो जो है भी नहीं 
है कहीं न कहीं 
बहता रहा है ...
इन धमनियों में,
जो जुनून-सा,
बनके मेरे सफर में...  

तू कौन है जो समंदर-सा? 
छाया है मुझपे, तू अम्बर-सा
सूरज-सा बातें तो करता है
हाँ डूबने से भी डरता है..
तू अकेला नहीं,
मुझमें तू कहीं,
रहता रहा है...
इन हौंसलों में
तू सुकून-सा,
बनके मेरे सफर में। 
picture source https://www.pinterest.com/pin/253327547766434060/

5 comments:

  1. It is really nice to see "Hindi" script after a long long time. I just realized that Hindi is a beautiful language and I should not allow myself to forget it.
    Beautiful poem indeed. Thanks for sharing.

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  2. Such softness in these lines. Beautiful my dear.

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    Replies
    1. softness... i wonder. Thank you. keep talking:)

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