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Yes its sinking in.. Rank 40, CSE 2015.The UPSC circle- the close and the beginning.

Bagh-e-Bahisht Se Mujhe Hukam-e-Safar Diya Tha Kyun Kaar-e-Jahan Daraz Hai, Ab Mera Intezar Kar                      - Mohammad...

Friday, October 20, 2017

The life you have forgotten to live.

Whatever lies between
- the ocean and the desert -
- your jumping up and hitting the ground -
- between fear and love -
is calling you.

Go live it.

"साँस लेने की तेरे, वजह और भी हैं 
तेरी इस ज़मी पर,जहां और भी हैं 
तू जो जी रहा है,तू क्यों जी रहा है ?
पूछने आने वाले , इम्तेहां और भी हैं। "
photographed clicked at: Uttarkashi, India

Thursday, September 28, 2017

September songs - The coordinates beyond dates and time


"तू कौन सवेरा है मेरा , 
मै उड़ने लगा तुझसे मिलके 
मैं मैं भी रहा, तू तू भी रहा ; 
कुछ ऐसे घुला तुझमें मिलके 

तू पलकों पर , उड़ता है मेरी 
- तस्वीरों सा -
- तकदीरों सा -
तू आँखों से , रिसता है मेरी 
- जज़्बातों की -
- ताबीरों सा -
तू चूड़ी कंगन झुमके की 
झंकार सा मुझमें बजता है 
तू बंसी के संगीत सा है  
मुझमें हर्फों सा बसता है 

तितली के तू पंख भी है 
पेड़ों का हरा तू रंग भी है 
तू बरगद की छाया भी है 
तू शीशम के पत्तों की खनक 
तू शाम के दूध की प्याली में 
केसर की तरह घुलती हसरत 
तू कोहरे से लिपटी खुशबू है 
तू ओस में  लिपटा पानी है
जितनी तुझमे मेरी है सुन,
उतनी मुझमें तेरी कहानी है। .

तू एक बरसता लम्हा है 
चंद करोड़ों सालों -सा 
कभी तेज़ बहुत तू चलता है 
कभी हौले से मुझमें ढुलके 
मैं मैं भी रहा, तू तू भी रहा ; 
कुछ ऐसे घुला तुझमें मिलके।" 
ताबीर  = meaning, interpretation
हर्फ़  =  alphabet

Tuesday, August 29, 2017

The transformations to reach the other.


You love me like water.
You find your ways
- to reach me -
As rain or fog
or dew or frost
What love can build and transform
- you teach me -

Monday, August 21, 2017

The stranger who knows you.

May be you just knew the right wavelengths. So wherever you touched me, 
you coloured everything beautiful.
Like you knew my darkness.
Like you had seen my light.

Tuesday, August 8, 2017

To a firefly.

रास्तों में कहीं रौशनी मिल गयी
मंज़िलों तक मेरे साथ चलना मगर।
मौसमों को बदलते हुए देखना,
भोर को सांझ में ढलते देखना,
और मुझे आसमां और ज़मी के दरमियां
सूखे पत्तों पे चलते हुए देखना।

हाँ सवेरे से  जब रात हो जायेगी,
इस ज़मीं की हर इक चीज़ सो जाएगी,
देर तक जागते मेरे दो नैन में;
एक आधा-सा बन ख्वाब जलना मगर।

रास्तों में कहीं रौशनी मिल गयी
मंज़िलों तक मेरे साथ चलना मगर।

रौशनी  ने कहा , भोर नज़दीक  है ;
मैंने  उससे  कहा और सब ठीक  है;
ढूंढ ला तू  फिर-से  आज वो जुगनू मेरा …
जो जानता है, मेरे साथ जगना  मगर।

जुगनुओं  को  बुझते -जलते देखना
वायदों  को पिघलते  हुए देखना।
और मुझे धुप छाओं  के  इस खेल  में ;
गिरते  उठते  संभलते  हुए देखना।

हाँ सवेरे से  जब रात हो जायेगी,
इस ज़मीं की हर इक चीज़ सो जाएगी,
देर तक जागते मेरे दो नैन में;
एक अधूरा सा बन ख्वाब जलना मगर।

रास्तों में कहीं रौशनी मिल गयी
मंज़िलों तक मेरे साथ चलना मगर। 

Thursday, August 3, 2017

Essays on travel - Breathing.

मौला इतना  बतला दे तू , क्यों बिसमिल -बिसमिल फिरता हूँ ?
है कौन मुसलसल सा मुझमें , जिसे रोज़ तलाश मै करता हूँ  ?
मुझको मुझसे यूँ रिहा कर दे ,
मै मिल जाऊँ जो फ़िर मुझमें। 
तू उतना ही मेरा भी है ,
मै जितना रहता हूँ तुझमें। 

ps: मुसलसल = continuous, linked in a series.
Picture clicket at Fatehpur sikri, Agra, India

Wednesday, August 2, 2017

Because you were built stone by stone.

No. Not your beauty and finesse which took me.
Nor your arches and hues, engravings and calligraphy.
They were magnificent, no doubt.
But I have reached,felt, absorbed 
- the stone you are built up of -
and how you have kept it
- integrated -

Because I know,
That's what makes you stand tall.
That's what will draw these birds to you each day.
Because l know,
You were built stone by stone.

Picture clicked at: Fatehpur sikri, Agra, India.

Thursday, July 20, 2017

What goes on in the heart of the city...


" कुछ बेलफ़्ज़ों- सी बातें हैं ,
कुछ लफ़्ज़ों-सी है ख़ामोशी 
कैसे मै कागज़ पर लिख दूँ 
है कौन यहाँ किसका दोषी?"


Tuesday, June 6, 2017

The star shrinks in its own gravity.

मै ये कहाँ आ गया
किसको कहूँ , न कहूँ ?
मैं हूँ अभी भी वहाँ
बैठा हुआ, हूबहू
मै हँसता हूँ ,
रो पड़ता हूँ
हूँ भूला ,
याद भी करता हूँ
- मै स्याही हूँ -
अपने रंगों से 
रोज़ मैं रोज़ झगड़ता हूँ
मै  बादल -सा घिर जाता हूँ
मै पागल - सा फिर आता हूँ
इन शहरों में
इन कसबों में
हर गाँव की
पगडंडी में
- जंगल जंगल -
किसको ढूंढूं ?
मैं रातों में , 
बीच अँधेरे और सवेरे के
आँखें खोलूँ ,आँखें मूंदूँ,,,
- ढूंढूं तेरी -
धड़कन की धुन
के बीच तेरी
- कंपन कंपन -
और फिर छुपकर
पलकों के तले
रिसती - रिसती
उलझन - उलझन।
पर बीच कहीं उसके मैंने
तेरी आँखों में
जो परियाँ  नाचती देखी थी,
उन परियों के
घरौंदों में
जलता है कहीं
एक काँच का पल
जग चूड़ी कंगन पहनेगा 
जलते उस काँच के रंगों का 
मैं कानों के इन बूंदों में 
पहनूँ रोज़ तुझे क्यों लम्हों सा ...
क्यों मै सोलह श्रृंगार करूँ ?
संगीत तेरा क्यों रोज़ सुनूँ ?
तोड़ूँ सब या तेरे ख़्वाब बुनूँ
हर रोज़ फिरूं
पागल पागल
बेचैन -बेचैन
बिस्मिल - बिस्मिल
बेकल - बेकल
किससे पूछूँ ?
तू मेरा कौन है?
मै तेरा कौन हूँ?
कौन अरमान है?
कौन अनजान है ?
दे बता अब ख़ुदा
अब तो ख़ुदा , दे बता ...